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मूवी रिव्यू / बायकॉट के नारों के बीच तेजाबी फिजाओं में एक उम्मीद जगाती है दीपिका की 'छपाक'

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अमित कर्ण, बॉलीवुड डेस्क, मुंबई.  तीसरी दुनिया के देशों में बंदिशों और आजादी के बीच के निरंतर संघर्ष में सबसे मुश्किल है एक औरत का बेखौफ होकर अपनी मर्जी से जीना। सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत हर मोर्चे पर डर का साया उन पर बना ही रहता है। न जाने कब हादसे किस शक्ल में बदकिस्मती उनका जीवन से खुशियों को बेरंग कर दे।

छपाक उस मुल्क की कहानी है, जहां दुनिया में सबसे ज्यादा तेजाबी हमले होते हैं। कहानी एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल से प्रेरित है। उनके जीवट और तेजाब की बिक्री बैन करने के लेकर प्रयासों से देश वाकिफ है। हालांकि उस पर सिस्टम से सख्त कदम अब तक नहीं उठे हैं। एसिड की बिक्री नियंत्रित तो है, पर उस पर पाबंदी नहीं है। वह भी तब, जब देश उनसे होने वाले हमलों के मामलों में आज भी सबसे ऊंची पायदान पर है।

एक नया दस्तावेज बनेगी 'छपाक'

कहानी में है दम

नायिका 19 साल की हंसमुख और हसीन मालती की है, जो उस तबके से आती है, जहां अपने लिए सपने देखना ही बहुत बड़ी बात होती है। ऐसे ही हालात में उसके सपनों को बशीर खान ऊर्फ बब्बू की नजर लग जाती है, जो समाज पर बदनुमा दाग है। जब बब्बू के नापाक इरादों को मालती नकार देती है तो वह उस पर तेजाबी हमला करवाता है। वह भी अपनी रिश्तेदार परवीन शेख से, जो खुद एक महिला है। हालांकि शुरुआत में इसका शक मालती के बॉयफ्रेंड राजेश पर जाता है। मालती के परिवार की आर्थिक स्थिति नाजुक है, जिसे उसके पिता की मालकिन शिराज और उनकी वकील अर्चना का सहारा मिलता है। पत्रकारिता और नौकरी छोड़ तेजाबी हमलों में बचे लोगों के हक के लिए एनजीओ चलाने वाला अमोल मालती के संघर्ष का हमसफर बनता है।

डायरेक्शन में है तड़प

अस्सी के दशक में 'छपाक' जैसी फिल्मों को मुख्यधारा के मेकर्स और एक्टर्स व एक्ट्रेसेज का आंशिक साथ मिलता था। उस मिथक को मालती के रोल में खुद दीपिका पादुकोण ने आकर तोड़ा है। तलवार और राजी जैसी सधी और गंभीर ट्रीटमेंट देने वाली मेघना गुलजार ने यहां फिल्म का टेंप्रामेंट का सुर उन फिल्मों से और ऊंचा रखा है। सारे किरदारों को मेलोड्रैमेटिक कतई नहीं होने दिया है। एक संजीदा सोशल रेस्पॉन्सिबिलिटी के तहत उन्होंने यह कहानी पेश करने की कोशिश की है। 

कलाकार दमदार, संगीत कमजोर

इस काम में उन्हें दीपिका पादुकोण, विक्रांत मैसी, मधुरजीत सरघी समेत बाकी साथी कलाकारों का साथ मिला है। दिक्कत फिल्म का किरदारों और घटनाक्रम के साथ अति ईमानदार रवैये को अपनाने से हो गई है। हालांकि वैसा ट्रीटमेंट रखना फिल्मकार की जरूरत थी, पर उस क्रम में फिल्म जरा एंगेज करने से रह जाती है। शब्दों से जादू जगाने वाले गुलजार ने गाने लिखे हैं। शंकर एहसान लॉय का संगीत है, पर इस बार वह दिल में गहरा नहीं उतर पाते हैं। 

स्क्रिप्ट जरूरत से ज्यादा कसी हुई

मालती के रोल में दीपिका की कोशिश जुनूनी लगी है। अमोल की विपरीत हालातों के प्रति खीझ को विक्रांत मैसी ने बखूबी पेश किया है। लॉयर अर्चना की भूमिका को मधुरजीत सरघी ने जीवंत किया है। फिल्म में असल जीवन में तेजाबी हमले झेल चुकीं युवतियों ने भी काम किया है। स्क्रिप्ट जरूरत से ज्यादा कसी हुई है। उसके चलते किरदारों के दर्द और संघर्ष स्थापित होने से रह जाते हैं। 

छपाक' बॉलीवुड के लिए खास

यह फिल्म कई मायनों में खास है। यह समाज के उस नासूर की ओर इशारा करता है, जिस पर सिस्टम की ओर से सर्जिकल स्ट्राइक नहीं हो रहा है। इस तरह की मुद्दा प्रधान फिल्मों के लिए चुनौती संजीदगी और सनसनीखेज के दो पाटों के बीच संतुलन साधने की होती है। अलबत्ता 'छपाक' को बॉलीवुड की एक रेगुलर फिल्म की नहीं, एक दस्तावेज के तौर पर देखा जाना चाहिए।